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Friday, December 4, 2009

कभी-कभी...


कभी-कभी

धुंधली तेरी प्रतिच्छाया,
जाने कहाँ से आकर,
द्रग कोनों से प्रवेश कर,
नेत्र पटल आच्छादित करती है...


मैं देर तक
उसके वश होकर
अपलक
कुछ देर खडा रह कर
फिर लेट कर
उसे निहारता हूं.


तभी कोई आहट,
चेतन करती है मुझे,
मैं जल्दी से
प्रेम को माध्यम बना,
तेरी प्रतिच्छाया को
ह्रदय वास करना चाहता हूँ.


किन्तु, द्रग कोनों से निकल,
मुझे बना विकल
सकल वह आकृति
वायु में विलय हो जाती है.
कभी-कभी...


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