मेरे ख़त का जवाब
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मेरे ख़त का आपसे, जवाब आया.
कल रात मुझे, खूबसूरत ख्वाब आया.
चमन के गुल से, ये मुलाक़ात थी,
लौटकर मैं घर, बाग़ - बाग़ आया.
कोई भी कोना अब, न अंधेरा रहे,
खुद चल के मेरे घर, आफ़ताब आया.
तन्हाई के मेरे दिन, बीतते कैसे,
तेरा ग़म मेरे काम, बेहिसाब आया.
चुपके मिलने की शिकन , न बात फैले,
मिलना था ओढ़कर, वो नकाब आया.
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मेरे ख़त का आपसे, जवाब आया.
कल रात मुझे, खूबसूरत ख्वाब आया.
चमन के गुल से, ये मुलाक़ात थी,
लौटकर मैं घर, बाग़ - बाग़ आया.
कोई भी कोना अब, न अंधेरा रहे,
खुद चल के मेरे घर, आफ़ताब आया.
तन्हाई के मेरे दिन, बीतते कैसे,
तेरा ग़म मेरे काम, बेहिसाब आया.
चुपके मिलने की शिकन , न बात फैले,
मिलना था ओढ़कर, वो नकाब आया.
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