Friday, December 4, 2009
वफ़ा की राह में...
वफ़ा की राह में कामयाब, ज़िन्दगी कर ली.
दर्दे ग़म सह ना सके तो, खुदकुशी कर ली.
कहा लहरों ने, घर जाओ, जाते क्यों नहीं,
बिखरी ग़र जिंदगी है, सजाते क्यों नहीं,
फ़िर सुन के दास्ताँ मेरी, बंदगी कर ली.
एक समय था वो हमको, देखते भी न थे,
मिल जाते थे राहों में, हाल पूछते ना थे,
वक़्त वो आया के, हमसे बात भी करली.
सुनना ग़र चाहो तो ये, फ़लक जितनी है,
मुख्तसर सी दास्ताँ मेरी, फ़कत इतनी है,
दिल देके नाकाम, मैंने ज़िन्दगी कर ली.
*******************
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
0 comments:
Post a Comment